ऋग्वेदः मण्डलं 4
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त्वां ह्य॑ग्ने॒ सद॒मित्स॑म॒न्यवो॑ दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं न्ये॑रि॒र इति॒ क्रत्वा॑ न्येरि॒रे । अम॑र्त्यं यजत॒ मर्त्ये॒ष्वा दे॒वमादे॑वं जनत॒ प्रचे॑तसं॒ विश्व॒मादे॑वं जनत॒ प्रचे॑तसम् ॥ ४.००१.०१ हे अग्नि, आपने यज्ञ के द्वारा देवताओं को अमर्यादित रूप से प्रसन्न किया। आप अमर्यादित देव को अपने द्वारा मरते मनुष्यों में भी प्रतिष्ठित करते हैं। यज्ञ के माध्यम से आपने सम्पूर्ण जगत में देव को प्रतिष्ठित किया। O
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